लाल हवेली: शिवानी

लाल हवेली: शिवानी

तहिरा ने पास के बर्थ में सोए अपने पति को देख और एक लंबी सांस खींचकर करवट बदल ली. कंबल से ढकी रॆहमान अली की ऊंची तोंद गाडी के झकोलों से रह-रहकर कांप रही थी. अभी तीन घंटे और थे. तहिरा ने अपने नाज़ुक कलाइ में बंधे हीरे की जगमगाती घढी को कोसा कम्बख्त कितनी देर में घंटी बजा रही थी. रातभर एक आंख भी नहीं लगी थी उसकी. पास क बर्थ में उसका पति और नीचे के बर्थ में उसकी बॆटी सलमा दोनों नींद में बेखबर बेहोश पडे थे. तहिरा घबरा कर बॆठ गयी. क्यों आअ गयी थी वह पति के कॆहने में सॊ बहाने बना सकती थी! जो घाव समय और विस्म्रिती ने पूरा कर दिया था उसी पर उसने स्वयं ही नशतर रख दिया अब भुगतने के सिवा और चारा ही क्या था!

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हिन्दी काव्य, कथा और संस्क्रिती में आपका स्वागत है

इस कक्शा में हम कुछ आधुनिक हिन्दी काव्य और काहानीयों के माध्य्म से हिन्दी संस्क्रिती के बारे में कुछ जानकारी प्राप्त करेंगे.